Balaji Wafers की सफलता की कहानी | एक छोटे गाँव से भारत की तीसरी सबसे बड़ी स्नैक्स कंपनी बनने की कहानी
Balaji Wafers की सफलता की कहानी*
Balaji Wafers: एक छोटे गाँव से भारत की तीसरी सबसे बड़ी स्नैक्स कंपनी बनने की कहानी
Balaji Wafers की सफलता की कहानी
**नमस्कार दोस्तों,**
यह कहानी है 1970 के शुरुआती दौर की।
गुजरात के जामनगर जिले में एक छोटा सा गाँव था – *धुंधो राजी*, जहाँ आबादी थी सिर्फ़ 1500–2000 लोगों की।
उस गाँव में रहते थे *वीरानी परिवार*।
किसान परिवार, बेहद ग़रीब, यहाँ तक कि उनके पास साइकिल तक नहीं थी।
गाँव में बिजली भी नहीं थी।
लोग बहुत साधारण और कठिन जीवन जीते थे।
गर्मियों में कभी-कभार बाहर से कोई बर्फ का गोला बेचने आता तो बच्चे 5 पैसे का गोला या मूंगफली खाते।
लोग खेती करते और उसी से पेट भरते।
लेकिन एक साल बारिश नहीं हुई, सारी फसल सूख गई।
जब दो महीने बाद बरसात आई तो लोगों को उम्मीद जगी।
उन्होंने फिर से बोया, लेकिन फिर बारिश धोखा दे गई और फसलें फिर से बर्बाद हो गईं।
गाँव में अकाल पड़ गया।
अब सोचिए, ऐसे माहौल में रहने वाला एक *15–16 साल का लड़का* बाद में *बिलियनेयर* बन गया।
यह कहानी सुनने में *असंभव* लगती है, लेकिन यह सच्ची है।
यही कहानी है *बालाजी वेफर्स* की, जिसे शुरू किया तीन भाइयों ने – *भीखू भाई, कन्नू भाई और चंदू भाई* ने।
आज यह कंपनी *PepsiCo* जैसी बड़ी कंपनियों को टक्कर देती है।
### **संघर्ष की शुरुआत**
अकाल के बाद उनके पिता *पोपट भाई वीरानी* ने ज़मीन बेच दी और बेटों को कहा –
"अब गाँव में कुछ नहीं रखा। तुम लोग बाहर जाकर अपनी किस्मत आज़माओ।"
सबसे छोटे भाई कन्नू गाँव में रह गए, बाकी तीन भाई जेब में थोड़े से पैसे और आँखों में सपने लिए राजकोट आ गए।
पहले उन्होंने खेती से जुड़ा कारोबार (खाद-बीज का) शुरू किया, लेकिन धोखा खा गए और कारोबार डूब गया।
फिर सोचा डेयरी आउटलेट खोलेंगे, लेकिन पैसे डूबने से वह सपना भी खत्म हो गया।
गुज़ारा करने के लिए चंदू भाई ने *एस्ट्रोन सिनेमा* में कैंटीन बॉय की नौकरी पकड़ ली – पगार सिर्फ़ ₹90।
वहाँ से सीखा उनका पहला सबक –
👉 “कर्म ही धर्म है। कोई काम छोटा या बड़ा नहीं, ईमानदारी से करना चाहिए।”
उन्होंने मेहनत से काम किया – कैंटीन में खाना परोसना, पोस्टर लगाना, टिकट चेक करना, यहाँ तक कि फटी कुर्सियाँ भी ठीक करना।
उनकी लगन देखकर मालिक ने उन्हें कैंटीन का कॉन्ट्रैक्ट दे दिया।
### **पोटैटो चिप्स का मौका**
कैंटीन में सबसे ज्यादा डिमांड थी – *वेफर्स (पोटैटो चिप्स)* की।
लेकिन सप्लायर समय पर और क्वालिटी में माल नहीं देता था।
तब चंदू भाई ने सोचा –
"क्यों ना अपने ही वेफर्स बनाए जाएँ?"
1982 में घर के आँगन में छोटा-सा सेटअप लगाया और आलू के वेफर्स बनाने लगे।
बहुत कोशिश और मेहनत के बाद उन्होंने ऐसा टेस्ट तैयार किया जो सबको पसंद आया।
1984 में उन्होंने ब्रांड नाम चुना – **बालाजी वेफर्स**।
### **धीरे-धीरे बढ़ता कारोबार**
शुरुआत में दुकानदार धोखा देते – पैकेट वापस कर देते, पैसे नहीं चुकाते।
लेकिन भाइयों ने हिम्मत नहीं हारी।
साइकिल, फिर मोटरसाइकिल और रिक्शे में बैठकर गाँव-गाँव जाकर चिप्स पहुँचाते।
क्वालिटी और टेस्ट इतना अच्छा था कि धीरे-धीरे पूरा राजकोट उनका ग्राहक बन गया।
1989 में उन्होंने 50 लाख का लोन लेकर गुजरात का सबसे बड़ा वेफर्स प्लांट लगाया।
### **बालाजी का विस्तार**
धीरे-धीरे बालाजी वेफर्स पूरे गुजरात और फिर देशभर में मशहूर हो गया।
आज कंपनी का सालाना कारोबार **₹6000 करोड़** है।
अब उनके पास 4 बड़े प्लांट हैं – राजकोट, वसाड़, इंदौर और लखनऊ में।
50 से ज्यादा तरह के स्नैक्स बनाते हैं और UAE, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका तक एक्सपोर्ट करते हैं।
### **ज़िंदगी के पाँच सबक (Life Lessons)**
- **कर्म ही धर्म है** – काम छोटा-बड़ा नहीं होता।
- **चिंता नहीं, चिंतन करो** – समस्या आए तो हल ढूँढो।
- **कूद पड़ो** – ज़्यादा सोचने से अच्छा है कदम उठाना।
- **धुन होनी चाहिए** – जिस काम से प्यार करो, उसी में फोकस करो।
- **सेल्स नहीं, सर्विस** – ग्राहक को क्वालिटी दो, वह खुद आएगा।
### **आज का बालाजी वेफर्स**
- भारत की तीसरी सबसे बड़ी स्नैक्स कंपनी (PepsiCo और Haldiram के बाद)।
- पश्चिमी भारत में (गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्य प्रदेश) सबसे बड़ा ब्रांड।
- अब भी *फैमिली बिजनेस* – भाइयों और उनके बच्चों द्वारा चलाया जा रहा।
- फिलॉसफी – *“लक्ष्मी के पीछे मत भागो, नारायण का नाम लो, लक्ष्मी खुद आ जाएगी।”*
👉 यह कहानी हमें सिखाती है कि गरीबी, मुश्किलें या असफलता – कुछ भी आपको रोक नहीं सकती, अगर आपके पास मेहनत, लगन और सही सोच है।
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